इशारा, उलझनें, हक़ीक़त, जहर, आईना, ज़िम्मेदारी

इशारा तो मदद का ही कर रहा था, डूबने वाला..
यारां-ए- साहिल ने सलाम-ए-अलविदा समझा..


उलझनें मीठी भी हो सकती है..
जलेबी इस बात का जिन्दा उदाहरण है…..


बस हक़ीक़त ज़ुबान पर रखदे।
ख़ुद को फिर इम्तिहान पर रखदे।।
एक दिन तू फ़लक़ को चूमेंगा।
सोच ऊंची उड़ान रखदे।।


तेरे लहजे में लाख मिठास सही मगर,
मुझे जहर लगता है तेरा औरों से बात करना…..


आज टूट गया तो
बच-बच कर निकलते हो…
कल आईना था तो
रुक-रुक कर देखते थे…


शब्दों में ज़िम्मेदारी झलकनी चाहिए
आप को और भी बहुत लोग पढ़ते है..